****बरखुरदार! थोड़ी सी ही तो है****

बाहर कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी, समुद्र तल से 6000 फ़ीट ऊपर, -16° C तापमान और लगभग 5 फुट बर्फ की सतह दूर दूर तक फैली थी। रात के समय जब  चांदनी उस बर्फ की चादर पर अपनी रौशनी बिखेरती तो यूँ लगता था मानो सफ़ेद बदलो का अथाह समुद्र सामने हो, उसके ऊपर सितारों से पटा आसमान और पश्चिम में बलखाती आकाश गंगा का सौंदर्य शब्दो में बयां करना नामुमकिन है। इस नयनाभिराम के बावजूद यहां खड़ा होना दूभर था क्योंकि पारा शून्य से लगभग सोलह डिग्री नीचे, और हवा का वेग मानों हडिडयां गलाने पर उतारू था। इसीलिए 6 सैनिकों की वो टुकड़ी बर्फ के दामन में बनी एक छोटी सी चौकी के भीतर से ही निगरानी कर रही थी।

12 दिसम्बर की शाम करीब 6:30 बजे, अँधेरा लगभग अपने पैर पसार चुका था। लेफ्टिनेंट सतेंद्र पंवार का प्रशिक्षण के बाद सीमा पर तैनाती का आज पहला दिन था। सूबेदार करतार सिंह मचान पर चढ़ कर निगरानी में व्यस्त, दूरबीन से चारो ओर नज़र रखे हुए थे। लेफ्टिनेंट रणदीप ठाकुर अंदर चौकी में कप्तान विक्रम चौहान को दिन का ब्यौरा दे रहे थे। उम्र में सबसे बड़े बिस्मिल्लाह खान चूल्हे पर कुकर चढ़ा कर बैठे थे और सीटी आने का इंतज़ार कर रहे थे। टेक्निकल पद पे भर्ती हुए इंजीनियर थॉमस सैटेलाइट फ़ोन की मरम्मत करते हुए दैनिक ब्यौरा तराई में बनी बड़ी चौकी तक पहुचाने के लिए इंतज़ाम कर रहे थे।

“लेफ्टिनेंट पंवार! आज आपका पहला दिन है, दैनिक ब्यौरा देने की इच्छा रखते हो?” थॉमस ने पूछा।

“यस थॉमस, मैं जरूर करना चाहता हूँ। वैसे आप कर क्या रहे हो?” पंवार ने सेटेलाइट फ़ोन की तरफ देखते हुए उत्सुकता से कहा।

“इतनी ऊँचाई पर साधारण फ़ोन काम नहीं कर पाते हैं, इसलिए हमें ये सेटेलाइट फ़ोन इस्तेमाल करना पड़ता है। इस से पूरी दुनिया में कहीं भी, कभी भी, किसी भी दूसरे फ़ोन पर बात की जा सकती है। अभी मैं इससे बेस कैंप को संपर्क कर रहा हूँ।” थॉमस ने फ़ोन के बटन दबाते हुए पंवार को समझाया।

“अच्छा! इससे कहीं भी बात की जा सकती है?” पंवार ने थॉमस की तेज़ी से चलती हुई उंगलिओ को देखते हुए पूछा। “ये तो बहुत काम की चीज़ है, सब लोगो को एक एक क्यों नहीं दे देते?”

“पंवार जी! इस एक फ़ोन की कीमत ही 70 हज़ार रूपये है और एक मिनट बात करने के लगभग 50 रूपये लगते हैं। सरकार को हम इतने भी प्यारे नहीं। मुश्किल और वीरान जगह बनी चौकियों में ही इनका इस्तेमाल होता है। उसके ऊपर हमें निजी कॉल करने की अनुमति नहीं है, अगर किसी को पता चला तो कार्यवाही भी हो सकती है।” थॉमस ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा।” मन में आये ख्याल को मन में ही रखते हुए पंवार ने मायूसी से  कहा।

“ये लो बेस कैंप से संपर्क हो गया है, आप दैनिक ब्यौरा दे दीजिये।” थॉमस ने ट्रांसमीटर पंवार की तरफ करते हुए कहा।

सतेंद्र पंवार ने रिसीवर लिया और दिन में हुई सारी कार्यवाही का विवरण बेस कैंप में मौजूद जनरल को देना शुरू कर दिया। जब तक पंवार ने अपना काम खत्म किया तब तक सरे लोग चौकी में ही आ गए थे और खाना खाने की तैयारी कर रहे थे।

बिस्मिल्लाह खान ने कुकर चूल्हे से उतारा और रणदीप ने सबकी थाली में खाना परोसा। दूसरी तरफ से करतार सिंह रम की बोतल लिए आ रहे थे। उस दिन ठण्ड बहुत ज्यादा थी और चौकी के आसपास हलचल बिलकुल भी नहीं थी। ऐसे शांत माहौल वाले दिन दो-चार पेग पी लेना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती थी। सब लोग घेरा बना कर बैठ गए और रणदीप ने सबकी थाली उनके आगे बढ़ाई। साथ ही करतार ने 6 गिलास में थोड़ी थोड़ी रम और पानी मिलाकर सबके आगे बढ़ाया। सबने अपना अपना गिलास उठा लिया सिर्फ सतेंद्र को छोड़ कर। बाकी लोग उसकी तरफ देख कर इंतज़ार करने लगे, लेकिन वो खाने पर ही ध्यान दे रहा था।

“सर जी, सब लोग इंतज़ार कर रहे हैं। उठाइये अपना गिलास।” करतार सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा।

सबकी नज़रे अपने ऊपर देखकर सतेंद्र थोड़ा हकपका गया और फिर रखे गिलास को देखा। देखकर वो बोला – “जी नहीं, माफ़ कीजिये मैं शराब नहीं पीता। फिर भी पूछने के लिए शुक्रिया।” दोनों हाथो को आपस में जोड़ कर क्षमा मांगने की मुद्रा में सर झुकाया और वापस खाने में व्यस्त हो गया।

“बरखुरदार! थोड़ी सी ही तो है, दवा समझ कर पी लीजिये।” बिस्मिल्लाह खान ने गिलास आगे बढ़ाते हुए कहा।

“आज ठण्ड बहुत ज्यादा है, दो घूँट ले लो आराम रहेगा।” ठाकुर जी बोले।

“अमां मियाँ ऐसे ना करो, पहले ही दिन कप्तान की बातों को नकार रहे हो।” खान साब तिरछी भौं चढ़ा कर बोले।

“जी आप चाहे तो मुझे सजा दे दीजिये, कोई मुश्किल काम दे दीजिये, जो परीक्षा लेना चाहते हैं ले लीजिये, लेकिन मैं शराब नहीं पियूँगा।” थोड़ा घबराते हुए लेकिन साहस भरी आवाज़ में सतेंद्र ने कहा।

“हा हा हा!! अरे बस करो तुम लोग, ज्यादा परेशान मत करो पंवार को उसका पहला दिन है। उसे नहीं पीनी तो मत कहो।” कप्तान ने थोड़ा डांटते हुए कहा।

“जी जनाब!” 4 मुस्कुराते चेहरे बोले।

ये समझते हुए के सब मज़ाक कर रहे हैं सतेंद्र ने थोड़ी राहत की सांस ली। खाना ख़त्म करके वो दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया और बाकी लोगो को हँसते – मुस्कुराते हुए देखने लगा। बाकी लोगो को इतना खुश देखकर वो अपनी ख़ुशी के बारे में सोचने लगा और खुद भी मुस्काते हुए ख़यालों में खो गया।

ग़ज़ल गाना बीच में ही छोड़ कर करतार सिंह सतेंद्र क पास आये।

“क्या भाई!! इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो? कुछ बात हमें भी बताओ। किसकी याद में हो।” छेड़ते हुए बोले।

“मियां शराब हमने पी है और मौज़ आप अकेले अकेले कर रहो हो। ये तो गलत बात है।” बिस्मिल्लाह ख़ान भी करतार का साथ देने आ गये ।

“अरे कुछ नहीं बस ऐसे ही। आप तो बहुत अच्छा गाते हो। एक कोई नज़्म और हो जाए।” सतेंद्र ने बात बदलने की कोशिश की।

“अजी बिलकुल!! आपकी फरमाइश पे पेश है। ज़रा गौर से सुनियेगा।” करतार फिर से गाने में मस्त हो गए।

“अच्छा बुरा ना मानो तो एक बात पूछ सकता हूँ?” ख़ान साहब ने इज़ाज़त लेनी चाही।

“हाँ हाँ बिलकुल पूछिए।”

“मैं नहीं कहता के पीना अच्छी आदत है, और तुमने सबको मना किया। यहाँ तक कि कप्तान साब को भी, तुम्हारे संकल्प की दाद देनी पड़ेगी। लेकिन ये सिर्फ एक इंसान की  इच्छाशक्ति का कमाल नहीं लगता, कुछ और राज़ है इसके पीछे।”

“रुकिए मैं दिखाता हूँ आपको।” कहकर सतेंद्र अपने पर्स में कुछ ढूंढने लगा।

“ये देखिए!” 4×4 इंच की एक पासपोर्ट साइज से कुछ बड़ी तस्वीर निकाल कर उसने खान साब की तरफ बढ़ाई। खान साब ने गौर से उस थोड़ी सी मुड़ी हुई, एक कोने से ज़रा सी फटी हुई तस्वीर को देखा। नीली फ्रॉक पहने एक लड़की, शायद 2-2.5 साल की होगी, सर पे छोटे छोटे बाल, एक हाथ की मुट्ठी में दूसरे हाथ की ऊँगली दबाते हुए शर्मा रही थी।

“अरे ये नन्ही सी हूर कौन है जनाब!! आपकी बेटी है?” तस्वीर को अपने हाथ में लेकर ध्यान से देखते हुए ख़ान साब बोले।

“हां जी! श्वेता। मेरा बच्चा, मेरी जान, मेरा सब कुछ।” आँखों में झलकता हुआ प्यार सबको दिख रहा था।

“खूबसूरत!”तस्वीर को और करीब से देखने लगे।

“जब पहली बार अस्पताल में इसको गोद में उठाया था तब एक वादा किया था खुद से और अपनी बच्ची से कि कभी ऐसा कुछ काम नहीं करूँगा जिस से इसको कोई भी परेशानी हो। बड़े बड़े रिश्ते टूटते हुए देखे हैं मैंने कुछ आदतों की वजह से। कुछ बहुत बड़ा नहीं चाहिए होता किसी रिश्ते को तोड़ने के लिए। कभी कभी तैश में कहे गए चन्द शब्द भी काफी होते हैं अच्छे खासे रिश्ते में दरार लाने के लिए। शराब पीकर इंसान का खुद पे काबू नहीं रहता, वो क्या करता है, क्या कहता है उसे होश नहीं रहता। मैं नहीं चाहता कि मेरा मदहोशी में किया कुछ काम या गुस्से में कहे कुछ शब्द मेरी बच्ची को किसी भी तरह से तकलीफ दें, या मेरे परिवार में कोई परेशानी लायें। आप लोगो का सम्मान रखने के लिए मान लीजिये मैंने थोड़ी ले भी ली तो उससे कुछ होता नहीं बस मैं अपने आप पे नाराज़ होता। अपनी बेटी से किया हुआ वादा तोड़ के, सिर्फ खुद कि ही नज़रो में गिर जाता। इसलिए सिर्फ शराब ही नहीं ऐसी कोई भी चीज़ या आदत से मैं दूर ही रहना चाहता हूँ जिस से मेरे आस पास किसी भी तरह कि नकारात्मकता आये। आप लोगो की बातों को नकारने का मेरा कारण सिर्फ यही था। आपको किसी बात का बुरा लगा हो तो मैं फिर से माफ़ी चाहता हूँ लेकिन मैं शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा।” आँख के एक कोने में आये हुए आंसू को पोछते हुए सतेंद्र ने खान साब को देखा और मुस्कुरा दिआ।

“मियां तुमने दिल जीत लिया यार पहले ही दिन। यही है सच्चा प्यार, एक बाप और उसकी संतान के बीच का प्यार, अपनी बच्ची के लिए तुम कुछ भी करने को तैयार हो। सर आई सेलूट यू।” और ऐसा कहकर अपना सीधा हाथ माथे पे लगा लिआ।

“अरे सुनो तुम लोग इधर आओ। देखो।” फिर सबको आवाज़ देकर बुलाया उन्होंने।

“देखो तो ज़रा बरखुरदार कितने खुशकिस्मत हैं, परी लग रही है बिलकुल।”

“ओह वाओ सतेंद्र बहुत प्यारी बच्ची है। क्या उम्र है इसकी अभी ” कप्तान विक्रम ने पूछा।

“आज 3 साल की पूरी हो गयी है।” चेहरे पर बहुत सारी ख़ुशी के साथ थोड़ी सी मायूसी भी झलक रही थी।

थॉमस समझ गया, उस वक़्त सतेंद्र ने ये क्यों जान ना चाहा था कि सैटेलाइट फ़ोन से कहीं भी बात करी जा सकती ह या नहीं और एक मिनट बात करने कि लागत सुनकर चुप क्यों हो गया था। उसने करतार सिंह को ये बात बताई। खान साब सुन रहे थे और वो तो पहले से ही मौज़ में थे और इतना सब सुने के बाद कहाँ चुप बैठने वाले।

“ले आओ मियां थॉमस अपना सैटेलाइट फ़ोन। सोच क्या रहे हो? इससे पाक इस्तेमाल उसका कभी नहीं हो पाएगा। ले आओ, ले आओ अब और देर ना करो। 10 बज रहे हैं घर पे सब सोने लगे होंगे बच्ची को ज्यादा देर रात में जगाना ठीक नहीं।”

सतेंद्र के चेहरे से मायूसी बिकुल गायब हो गयी थी और अब सिर्फ ख़ुशी ही ख़ुशी आँखों में चमक रही थी।

थॉमस ने फ़ोन सेटअप किया और सतेंद्र से घर का फ़ोन नंबर पूछा और एक एक करके बटन दबाने लगा। हर बटन दबने के साथ सतेंद्र कि मुस्कान और दिल कि धड़कन दोनों बढ़ने लगी। जब दूसरी तरफ घंटी बजने लगी तो थॉमस ने रिसीवर सतेंद्र क हाथ में दे दिया।

“हेलो!” सामने से एक महिला कि आवाज़ आयी। अपनी पत्नी उर्मिला की आवाज़ पहचान ने में एक पल भी नहीं लगा सतेंद्र को।

“हेलो उर्मिला। मैं बोल रहा हूँ। गुड़्डू सो गयी क्या?” प्रति मिनट 50 रूपये का ध्यान रखते हुए सीधा अपनी बेटी को पूछा।

“नहीं वो अपने गिफ्ट्स खोल रही है। रुको अभी बुलाती हूँ।”

“गुड़्डू, पापा का फ़ोन है लो बात करो।” कुछ दूर धीमी आवाज़ में सुनाई दिया।

“हेलो पापा..त्या कल लहे हो?” ये 6 शब्द सुनकर नहीं रोक पाया सतेंद्र खुद को और दोनों आँखों की किनारी में दो छोटी सी चमकती हुई बूंदे आगयी। वो ख़ुशी के आंसू थे। दिल में भरा हुआ प्यार शब्दों से नहीं उन प्यार के मोतिओं से निकल के आया।

“अमां मियां कुछ बोलोगे भी?” पीछे से खान साब बोले।

“जन्मदिन मुबारक हो मेरे बच्चे!! हैप्पी बर्थडे गुड़्डू!!” भरे गले से बस इतना ही निकल पाया।

“थैंक्यू पापा। पता है मुझे भोत थाले गिफ्ट मिले। आप कब आओदे?”

“बहुत जल्दी आऊंगा मेरे शोना बहुत जल्दी।”

“ओके आप मम्मी थे बात कलो, मैं गिफ्ट देख लही हूँ।” कहकर उसने फ़ोन उर्मिला को पकड़ा दिया।

“पागल ही है ये लड़की भी। आप ठीक हो ना। कब आओगे?”

“हा हा! अरे बच्ची है खेलने दो। हाँ मैं ठीक हूँ जल्दी ही छुट्टी मिलने वाली है। अच्छा रखता हूँ।” कहकर रिसीवर वापस होल्डर में रख दिया।

दोनों हाथो से पहले अपने आंसू पोछे उसके बाद वही हाथ जोड़कर सतेंद्र सबके सामने खड़ा हो गया।

“आज मेरा पहला दिन है, आप लोग मुझे ठीक से जान भी नहीं पाए। मैंने आप लोगो की बात को भी नकारा, निजी कॉल करने की अनुमति नहीं है उसके बावजूद आपने मेरी बात मेरी गुड़्डू से करवाई। मुझे नहीं पता मैं किस तरह आपका शुक्रिया अदा करूँ। अभी सिर्फ ये हाथ जोड़कर आप लोगो से यही कह सकता हूँ के बहुत बहुत शुक्रिया, मैं सुबह से यही सोच रहा था किसी तरीके एक बार मेरी बेटी से बात हो जाए और आप लोगो ने वो हकीकत कर दिया। मैं किसी भी तरीके से अगर ये एहसान चूका सकता हूँ तो कृपा करके जरूर बताइयेगा।”

“बरखुरदार बस करो अब रुलाओगे क्या। आओ एक एक जाम लगाते हैं।”

सुनकर एक बार के लिए सतेंद्र चौंक गया, लेकिन जब सर उठा क देखा तो खान साब की हंसी ने उनका मज़ाक जाहिर कर दिया।

“घबराओ मत मियां, मज़ाक कर रहा हूँ। और रही बात एहसान की तो इतना समझ लीजे आज से आप हमारे परिवार का हिस्सा हैं और परिवार में किसी को कोई दुःख ना हो इसके लिए सब कुछ किया जाता है। आपकी बेटी हमारी बेटी एक ही बात है। और अपनी बेटी को जन्मदिन की मुबारकबाद ना दें ऐसा कैसे हो सकता है। तो ये कोई एहसान नहीं है। हम लोगो की तरफ से श्वेता को तोहफा है उसके पिता से उसकी बात कराने का।”

सुनकर सब लोग मुस्काने लगे।

“ऑलराइट! सब लोग अपनी जगह पर पहुंच कर आराम करलो कल सुबह गश्त लगाने जाना है।” कप्तान ने बोलकर अपने पास वाली बत्ती बुझादी।

~DM

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